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दिल्ली से लखनऊ तक लगी संपत्ति की कतार : वेतन 25 हजार, खड़ा किया 250 करोड़ का कागजी कारोबार

लखनऊ  (मानवीय सोच)  बैंक खातों से 215 करोड़ की हेराफेरी करने का आरोपी संजय सिंह यादव दिल्ली के एक सीए का निजी कर्मचारी था। संजय का वेतन तो सिर्फ 25 हजार रुपये था लेकिन उसने हेराफेरी कर 250 करोड़ से ज्यादा का कागजी कारोबार खड़ा कर दिया था। गिरफ्तार किए गए संजय यादव ने साइबर क्राइम टीम के सामने कुबूल किया कि डेढ़ साल के अंदर उसने 37 बैंक खातों के जरिए 281 करोड़ की हेराफेरी की। हालांकि संजय ने खुद कहा कि जो दस्तावेज उपलब्ध हैं, उनमें सिर्फ 215 करोड़ का रिकॉर्ड है।

साइबर क्राइम टीम ने बृहस्पतिवार को फर्जी कंपनी बनाकर 200 करोड़ से अधिक की जीएसटी चोरी करने वाले गिरोह का पर्दाफाश किया है। हेराफेरी कर संजय यादव ने लखनऊ  से दिल्ली के बीच करोड़ों की संपत्तियां खड़ी कर लीं। पकड़ा गया आरोपी संजय बीएससी करने के बाद दिल्ली के एक सीए प्रदीप कुमार का निजी कर्मचारी बन गया। सीए उसे वेतन के रूप में 25 हजार रुपये देता था। कुछ दिनों तक सब ठीक चला।

इसके बाद सीए ने उसे कई कंपनियां खोलने के लिए कहा। इसके लिए उसने लड़कों की मांग की। संजय ने पुलिस टीम को बताया कि उसने 60 लड़के मुहैया कराए। इनके नंबरों का प्रयोग कर सीए ने कई कंपनियों का जीएसटी रजिस्ट्रेशन कराया। वहीं बैंकों में फर्जी दस्तावेज से खाते खुलवाए। इसके बाद इन्हीं कंपनियों के जरिए करोड़ों की टैक्स चोरी शुरू कर दी। वहीं कागजी कंपनियों के बैंक खाते संचालित करने के लिए भी उसे हर महीने रुपये मिलते थे।

दो साल पहले मास्टरमाइंड संग हुआ था गिरफ्तार
एसपी साइबर क्राइम त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, अभी तक की जांच में 18 कंपनियों के नाम सामने आए हैं। ये कंपनियां मेरठ में पकड़े गए 650 कंपनियों के 1700 करोड़ के जीएसटी चोरी के मामले में शामिल थीं। अब इस जांच का दायरा बढ़ा लिया गया है जिसमें सभी कंपनियों को शामिल किया गया है। संजय ने साइबर क्राइम टीम को बताया कि वह 21 मार्च 2020 को मेरठ में गिरफ्तार किया गया।

उसके साथ गिरोह का मास्टरमाइंड सीए प्रदीप कुमार भी गिरफ्तार हुआ था। दोनों ने जमानत कराई। इसके  बाद फिर से हेराफेरी करने में जुट गए। 37 कंपनियों के नाम से जीएसटी रजिस्ट्रेशन कराने के लिए सात मोबाइल नंबरों का प्रयोग किया था जिसमें से तीन उसके पास थे। जबकि अन्य मोबाइल उसकी पत्नी व दूसरे सहयोगियों के पास हैं। संजय के अनुसार, इस फर्जीवाड़े को करने केलिए सीए प्रदीप कुमार ने ही कहा था।

साढ़े सात हजार प्रतिमाह तय हुई थी रकम
आरोपी संजय ने साइबर क्राइम टीम के सामने कुबूल किया कि सीए और उसके बीच एक समझौता हुआ था जिसके तहत कंपनी का रजिस्ट्रेशन कराने व बैंक खाता संचालित करने के लिए प्रति कंपनी 7500 रुपये प्रतिमाह की दर से भुगतान होगा। पकड़ा गया आरोपी इनमें से ढाई हजार अपने पास रखता था। वहीं पांच हजार रुपये अन्य युवकों को देता था जो उसके इस काम में सहयोग करते थे। आरोपी ने पुलिस को बताया कि इसी सिलसिले में वह लखनऊ के राशिद से मिला था। राशिद के जरिए 20 युवकों को अपने फर्जीवाड़े के गिरोह में शामिल किया। उनको भी हर महीने तय रकम दी जाती थी। संजय ने बताया कि राशिद के माध्यम से अमीनाबाद के गीता इंटरप्राइजेज के नाम से 1.5 करोड़ के फर्जी क्रय-विक्रय बिल काटे गए।

इन कंपनियों के साथ किया फर्जी कारोबार
मेसर्स कृष्णा पेरोटेड जम्मू कश्मीर, मेसर्स कृष्णा पेरोटेड नई दिल्ली, मेसर्स सियाराम दिल्ली, कृष्णा परेरोटेक पीरागढ़ी दिल्ली, मेसर्स प्लास्टिक इंडस्ट्री नई दिल्ली, कुनाल ट्रेडर्स दिल्ली, जयमाला इंटरप्राइजेज दिल्ली, मेसर्स जेएमडी दिल्ली, मेसर्स ब्लू  ब्लैक नार्थ दिल्ली, इंडियन सर्विस लि. दिल्ली, बालाजी दिल्ली, गुल्लू इंटरप्राइजेज, स्पीफीड दिल्ली, शिवशंकर दिल्ली, कृष्णा पेट्रोरिड गुजरात, मेसर्स जीबीबीएस एनर्जी दिल्ली, मेसर्स फ्यूचर एनर्जी दिल्ली, मेसर्स शिवमनी इंजीनियरिंग इंदौर  और मेसर्स श्याम इंफ्रा स्ट्रक्चर दिल्ली शामिल है।

वहीं इसके अलावा मेसर्स अपटेक, राठौर ग्रुप, अख्लाक बैंगल्स, इंडिया मेटल फैब्रीकेटर्स, इंडियन बुड हाउस, हमदोसना एजेंसी, अर्श इंटरप्राइजेज, मेसर्स केओएन ट्रेडर्स का नाम भी शामिल है। इन फर्म के कागजों पर कारोबार किया गया जिसकी जीएसटी चोरी की गई।

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