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शपथग्रहण में क्यों लगे दो हफ्ते, योगी मंत्रीमंडल से पता चला

दिल्ली (मानवीय सोच) योगी आदित्यनाथ ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. पूर्ण बहुमत से जीतने पर भी सरकार के गठन में दो हफ्ते का समय लगा और मंत्रियों के नामों को देखकर यह बात साफ हो गई कि आखिर इसमें इतनी देर क्यों हो रही थी.लखनऊ के इकाना स्टेडियम, जिसका नाम अब अटल बिहारी वाजपेयी स्टेडियम हो गया है, में गुरुवार को योगी आदित्यनाथ ने दो उप मुख्यमंत्रियों समेत 52 मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. दस मार्च को चुनाव परिणाम आने के बाद से ही ये कयास लगाए जा रहे थे कि इस बार योगी आदित्यनाथ की सरकार में दो डिप्टी सीएम होंगे या नहीं और होंगे तो कौन होंगे? इन सब कयासों पर से आज पर्दा उठ गया. केशव प्रसाद मौर्य को विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद दोबारा उप मुख्यमंत्री बनाया गया जबकि पिछले उप मुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा को हटाकर उनकी जगह ब्रजेश पाठक को उप मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया है. ब्रजेश पाठक लखनऊ की कैंट विधानसभा सीट से विधायक चुने गए हैं और पिछली योगी सरकार में कानून मंत्री रहे हैं. सहयोगी दलों को भी कैबिनेट में जगह योगी मंत्रिमंडल में पीएमओ में कार्यरत रहे पूर्व आइएएस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा को भी जगह दी गई है जबकि बीजेपी की सहयोगी पार्टी अपना दल एस के विधायक आशीष पटेल और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद को भी कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तराखंड के राज्यपाल पद से इस्तीफा देने वाली बेबी रानी मौर्य को भी कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. पिछली बार उप मुख्यमंत्री रहे डॉक्टर दिनेश शर्मा के साथ ही श्रीकांत शर्मा, सतीश महाना, रमापति शास्त्री, जयप्रताप सिंह, सिद्धार्थनाथ सिंह और आशुतोष टंडन जैसे कई हाईप्रोफाइल नेताओं को इस बार योगी कैबिनेट में जगह नहीं मिल सकी है.

सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम पिछली योगी सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे श्रीकांत शर्मा का है जो मथुरा से लगातार दूसरी बार एक लाख से भी ज्यादा मतों से जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं. यह भी पढ़ेंः पांच साल सत्ता में रहने के बाद भी कैसे जीत गई बीजेपी योगी सरकार में फिलहाल 18 कैबिनेट मंत्री, 14 राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और बीस राज्यमंत्री बनाए गए हैं. मंत्रिपरिषद में जातीय समीकरणों को खास तवज्जो दी गई है और मंत्रियों के नाम देखकर यह भी साफ पता चल रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा इसमें केंद्रीय नेतृत्व की पसंद को भी खासा महत्व मिला है. केंद्रीय नेतृत्व की पसंद का भी ध्यान विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद केशव प्रसाद मौर्य को डिप्टी सीएम बनाया जाना और अरविंद कुमार शर्मा को कैबिनेट में शामिल करना इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं. अरविंद कुमार शर्मा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खास पसंद होने के बावजूद योगी आदित्यनाथ ने पिछली बार उन्हें अपनी कैबिनेट में जगह नहीं दी, यहां तक कि राज्यमंत्री भी नहीं बनाया था. इस बार उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाए जाने के पीछे यह माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ऊपर एक बार फिर उन्हें कैबिनेट में शामिल करने का दबाव था जिसे वो इनकार नहीं कर सके. केशव प्रसाद मौर्य उप मुख्यमंत्री रहते हुए सिराथू से विधानसभा चुनाव हार गए थे और ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि शायद उन्हें मंत्रिपरिषद में जगह ना मिले. दरअसल, इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा था कि केशव प्रसाद मौर्य, योगी आदित्यनाथ को अपना प्रतिद्वंद्वी समझते रहे और इसीलिए विधानसभा चुनाव हारने के बाद योगी आदित्यनाथ को यह मौका भी मिल गया है कि उन्हें डिप्टी सीएम बनाना तो दूर, मंत्रिपरिषद में भी शामिल ना करें, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के दबाव के चलते उन्हें ऐसा करना पड़ा.

बीजेपी के एक बड़े नेता और केंद्रीय संगठन में पदाधिकारी नाम ना छापने की शर्त पर कहते हैं कि उत्तराखंड में चुनाव हारने के बावजूद पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के पीछे साफ संदेश था कि योगी आदित्यनाथ को बतौर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को जगह देनी ही पड़ेगी. यह भी पढ़ेंः हार के बाद फिर पढ़े गए कांग्रेस के मर्सिये सिर्फ एक मुस्लिम मंत्री योगी सरकार में एकमात्र मुस्लिम मंत्री रहे मोहसिन रजा को इस बार जगह नहीं मिल सकी जबकि इस बार भी एक ही मुस्लिम को मंत्री बनाया गया है. दानिश आजाद अंसारी एकमात्र मुस्लिम हैं जिन्हें मंत्रिपरिषद में बतौर राज्य मंत्री जगह मिली है. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कानपुर के पुलिस आयुक्त का पद छोड़कर राजनीति में आए आईपीएस अधिकारी असीम अरुण को भी राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया है. वहीं योगी आदित्यनाथ के खास बताए जा रहे और सरोजनी नगर से विधानसभा चुनाव जीतने वाले प्रवर्तन निदेशालय के पूर्व अधिकारी राजेश्वर सिंह को मंत्रिपरिषद में जगह नहीं मिल सकी है. डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल नंदी, राकेश सचान समेत कई मंत्री ऐसे हैं जो दूसरे दलों से बीजेपी में आए हैं. ब्रजेश पाठक ने राजनीति की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की थी और बाद में बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए थे. बीएसपी में वो कई बार सांसद रहे.

साल 2017 में बीजेपी में शामिल हुए थे. नंदगोपाल नंदी भी उसी समय बीएसपी से बीजेपी में शामिल हुए थे जबकि राकेश सचान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से होते हुए 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में शामिल हुए थे. उत्तर प्रदेश के इतिहास में यह पहला मौका है जबकि किसी मुख्यमंत्री ने पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल करके मुख्यमंत्री पद की शपथ ली हो. शपथ ग्रहण को भव्य और एक मेगा इवेंट बनाने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी रही. शपथ ग्रहण समारोह में बीजेपी शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों के अलावा बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए. राजधानी लखनऊ को जगह-जगह सजाया गया था और बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स मुख्य जगहों पर लगाई गई थीं. शपथ ग्रहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अलावा नितिन गडकरी, स्मृति ईरानी समेत कई केंद्रीय मंत्री भी मौजूद रहे..

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