लखनऊ (मानवीय सोच) चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय में महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा (डीजीएमई ) के पद पर आईएएस अफसर श्रुति सिंह की तैनाती को लेकर बवाल शुरू हो गया है। डॉक्टरों का कहना है कि चिकित्सा शिक्षा संवर्ग से भरे जाने वाले पद पर आईएएस अफसर की तैनाती अधिकार हनन का मामला है। वे कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। वहीं इस मामले में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी आपत्ति जताई है।
उत्तर प्रदेश चिकित्सा शिक्षा सेवा नियमावली (प्रथम संशोधन) 1996 के तहत महानिदेशक का पद राजकीय मेडिकल कॉलेजों के प्रधानाचार्यों में से पदोन्नति द्वारा भरा जाना है। 1993 में डॉ. वीबी सहाय को डीजीएमई बनाया गया। वह 1994 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद वह कार्यवाहक डीजीएमई रहे। फिर 2009 में नियमित डीजीएमई के रूप में डॉ. एमसी शर्मा की तैनाती की गई, लेकिन कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को अवैध करार दे दिया। इसके बाद से कार्यवाहक डीजीएमई कार्य करते रहे। मई 2021 में आईएएस सौरभ बाबू को डीजीएमई की जिम्मेदारी दी गई। कुछ दिन बाद कार्यवाहक डीजीएमई के रूप में डॉ. एनसी प्रजापति को तैनात किया गया। 7 जून 2022 को आईएएस श्रुति सिंह की तैनाती कर दी गई है।
इसके बाद से डॉक्टर एकजुट हो गए हैं। उनका तर्क है कि जो पद राजकीय मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य से भरा जाना चाहिए, उसे आईएएस से भरा जाना नियमावली का उल्लंघन है। वे कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। दूसरी तरफ इस मामले को लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने भी मोर्चा खोल दिया है। आईएमए ने उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक को पत्र भी लिखा है। इसमें बताया गया है कि डीजीएमई का पद दूसरे संवर्ग से भरा जाना गलत है। यह भी बताया है कि 1995 में पहली बार एसके खरे को जिम्मेदारी दी गई थी, जिन्हें न्यायालय के आदेश पर हटाना पड़ा था। इसके बाद भी दोबारा इस पद पर आईएएस को तैनात कर दिया गया है। आईएमए ने सवाल किया है कि क्या पुलिस महानिदेशक का पद आईएएस से भरा जा सकता है?
ज्यादातर कार्यवाहक के भरोसे रहा पद
चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय चिकित्सक, नर्सेज और पैरामेडिकल स्टॉफ सहित अन्य मैन पावर तैयार करता है। मेडिकल कॉलेजों की निगरानी रखता है। विभिन्न पाठ्यक्रम से जुड़ी समस्याओं का भी निस्तारण करता है। इसके बाद भी यहां करीब 28 साल से कार्यवाहक डीजीएमई की ही तैनाती की जा रही है। जब भी नियमित डीजीएमई की तैनाती हुई यह पद आईएएस अफसरों को दे दिया गया। विभागीय सूत्रों का कहना है कि नियमित नियुक्ति नहीं होने के पीछे भी आला अफसरों का खेल है। वे नहीं चाहते है कि डीजीएमई स्वतंत्र बॉडी के रूप में कार्य करे।
नियमित तैनाती नहीं होने की बड़ी वजह
सूत्रों के अनुसार नियमावली के तहत इस पद को राजकीय मेडिकल कॉलेजों के प्रधानाचार्यों से भरा जाना है। आयोग से चयनित होने वाले प्रधानाचार्यों में चयन की तिथि और कार्यभार ग्रहण करने की तिथि को लेकर विवाद है। इस वजह से अभी तक डीपीसी नहीं हो पा रही है। प्रधानाचार्य लगातार डीपीसी की मांग कर रहे हैं। दूसरी बात यह है कि प्रधानाचार्यों के 10 वर्ष के कार्यकाल का मूल्यांकन किया जाता है। चरित्र पंजिका में उत्कृष्ट नंबर हासिल करने वाले इस पद के लिए योग्य माने जाते हैं, लेकिन शासन स्तर पर ज्यादातर की चरित्र पंजिका ही अधूरी है।
कोई विवाद जैसी स्थिति नहीं है। प्रधानाचार्यों की नियुक्ति के आधार पर वरिष्ठता क्रम निर्धारित किया जाता है। डीजीएमई पद पर नियुक्ति शासन स्तर से की गई है। पहले कार्यवाहक डीजीएमई थे, लेकिन अब नियमित तैनाती है। निदेशालय पूरी तत्परता से कार्य कर रहा है।
-आलोक कुमार, प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा विभाग
