डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान स्थित ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के डॉक्टरों ने समय रहते एक गर्भवती महिला मरीज में बॉम्बे ब्लड ग्रुप की पहचान कर ली और उसका इलाज शुरू कर दिया। समय रहते सटीक इलाज मिलने से महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की जान बच गई। इतना ही नहीं बाद में डॉक्टरों ने महिला का सुरक्षित प्रसव भी कराया। अब मां और बच्चे दोनों का स्वास्थ्य ठीक बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि गर्भवती महिला की रायबरेली के अस्पताल में ब्लड की जांच हुई, लेकिन बॉम्बे ब्लड ग्रुप की पहचान अस्पताल ठीक तरह से नहीं कर पाया, बल्कि बॉम्बे ब्लड ग्रुप की जगह o निगेटिव ग्रुप का ब्लड चढ़ा दिया गया। जिससे महिला की हालत बिगड़ गई।
महिला की हालत बिगड़ते देख अस्पताल से लखनऊ रेफर कर दिया गया। गंभीर हालत में डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान पहुंची गर्भवती महिला मरीज को भर्ती कर डॉक्टरों ने इलाज शुरू किया। इस दौरान जब जांच कराई तो बॉम्बे ब्लड ग्रुप की जानकारी हुई और यह भी पता चला कि गलत ग्रुप का ब्लड चढ़ने से महिला की हालत ज्यादा बिगड़ गई थी। समय पर इलाज मिलने से महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की जान पर मंडरा रहा खतरा टल गया। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सुब्रत चंद्रा ने बताया गया कि बॉम्बे ब्लड ग्रुप भारत में दस हजार में करीब एक व्यक्ति में पाया जाता है,
वहीं यूरोपीय व विकसित देशों में 10 लाख में से एक व्यक्ति इस ब्लड ग्रुप का होता है। इसमें Hh एक ही एंटीजन (H)लाल रक्त कणिकाए पाई जाती हैं। जिससे यह ABO ग्रुप से अलग होता है जिसके कारण इस ब्लड ग्रुप के मरीज को केवल Hh बॉम्बे ब्लड ग्रुप का ही रक्त लिया या दिया जा सकता है, लेकिन बड़े संस्थानों में ही इस ब्लड ग्रुप की पहचान सटीकता से हो सकती है, सामान्य अस्पतालों में जांच के दौरान कई बार बॉम्बे ब्लड ग्रुप के मरीज को ओ निगेटिव ग्रुप का मरीज समझ लिया जाता है और गलत ग्रुप का ब्लड चढ़ने से मरीज की हालत बिगड़ सकती है। इससे लिए शंका होने पर मरीज की जांच एक बड़े चिकित्सा संस्थानों में जरूर करानी चाहिए। उन्होंने बताया कि 25 वर्ष की महिला गर्भावस्था में रेफर होकर राम मनोहर लोहिया संस्थान आई। महिला को यूरिन में खून आने,सांस का फूलना और शिशु का गर्भ में कम घूमने की शिकायत के साथ पहुंची थीं।
