लखनऊ (मानवीय सोच) वैसे तो फर्जी बिल बनाकर उगाही का खेल तो पुराना है, पर अब इसमें एक नई तरकीब भी जुड़ गई है। उगाही के लिए जो नया ट्रेंड आया है, उसमें मीटर रीडर खुद गलत रीडिंग फीड करने के बजाय दूसरे डिवीजन के ऑनलाइन बिलिंग केंद्र के कलेक्शन कर्मी से सांठगांठ करके सिस्टम में फर्जी यूनिट फीड करवाते हैं। इसके बाद रीडिंग को दुरुस्त कराने के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं। ये ट्रेंड अप्रैल से ही शुरू हुआ है। खपत के मुकाबले कहीं ज्यादा का बिल आने पर उपभोक्ता उपकेंद्र से लेकर उपखंड तक दौड़ लगाते रहते हैं। कुछ शिकायतों की जांच हुई तो ये फर्जीवाड़ा सामने आया।
पुराने मामलों में सीधे तौर पर मीटर रीडर गलत रीडिंग दर्ज कर देते थे। इसमें कोई आंच आने पर उनकी गर्दन नप जाती थी। क्योंकि वे सीधे तौर पर पकड़ में आ जाते थे। लेसा प्रबंधन ने इस पर अंकुश लगाने के लिए बिल जमा करने वालों को खास आईडी नंबर अलॉट कर दिया। बिल में उसे बनाने वाले का आईडी नंबर भी दर्ज होता है।
यह व्यवस्था तो फर्जीवाड़ा करने वालों पर अंकुश लगाने के लिए की गई, पर मीटर रीडरों ने इनसे ही सांठगांठ शुरू कर फर्जी रीडिंग दर्ज कराना शुरू कर दिया। फर्जी रीडिंग दर्ज होने के बाद मीटर रीडर का खेल शुरू होता है। वह बिल तैयार होने के बाद संबंधित उपभोक्ता के पास जाकर उसे दुरुस्त कराने का ऑफर देता है। ऐसा नहीं है कि ऐसे मामले सामने नहीं आए। आए तो पर एसडीओ एवं एक्सईएन ऐसे बिल को संशोधित कराकर मामले का निपटारा करा देते हैं।
ऐसे में फर्जीवाड़ा का प्रकरण दब जाता है और खेल चलता रहता है। कैंट एसडीओ पंकज पांडेय एवं रेजीडेंसी एसडीओ आशीष कुमार ने ऐसे ही मामलों में उपभोक्ताओं की शिकायतों को गंभीरता से लिया तो आईडी नंबर के जरिए उगाही का खेल खेलने वाले दो कर्मचारी बेनकाब हुए। इनमें से एक मामला सुभाष मोहाल सदर निवासी नरेश चंद्र द्विवेदी का था, जिनका एक लाख रुपये का फर्जी बिल बना दिया गया था।
ये मामले बताते हैं कि कैसे चल रहा है खेल
मामला सामने आया तो ऑपरेटर, मीटर रीडर हुए बर्खास्त
