सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के कामकाज को लेकर चिंता को खारिज नहीं किया जा सकता

नई दिल्ली  (मानवीय सोच)  भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) एनवी रमना ने शनिवार को कहा कि उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम प्रणाली के कामकाज को लेकर सरकार की ओर से तथा विभिन्न हलकों में जताई गई चिंताओं को न तो नजरअंदाज किया जा सकता है, न ही खारिज. पूर्व सीजेआई ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए कॉलेजियम प्रणाली को आवश्यक घोषित करते हुए कई फैसले पारित किए. उन्होंने आगे कहा कि न्यायपालिका इस प्रक्रिया में शामिल कई पक्षों में से एक है. 

न्यायमूर्ति एनवी रमना ने यह भी कहा कि न्यायपालिका में पीठ पर विविधता सुनिश्चित करने के लिए एक संस्थागत तंत्र का अभाव एक समस्या है. वह एशियन ऑस्ट्रेलियन लॉयर्स एसोसिएशन इंक के राष्ट्रीय सांस्कृतिक विविधता शिखर सम्मेलन को ‘सांस्कृतिक विविधता और कानूनी पेशे’ विषय पर ऑनलाइन सम्बोधित कर रहे थे. 

उन्होंने कहा कि भारत में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति ‘कॉलेजियम प्रणाली’ के माध्यम से होती है, जिसमें शीर्ष अदालत के पांच वरिष्ठतम न्यायाधीशों को यह तय करने की पूरी शक्ति होती है कि न्यायपालिका में किसे नियुक्त किया जाना चाहिए. पूर्व सीजेआई ने कहा कि उन्होंने (अपने कार्यकाल में) विविध पृष्ठभूमि के न्यायाधीशों की नियुक्ति सुनिश्चित करने का प्रयास किया. 

उन्होंने कहा, ‘भारत के प्रधान न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, मैंने अपनी सिफारिशों के माध्यम से पीठ में विविधतापूर्ण प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की कोशिश की। हमारे द्वारा की गई लगभग सभी सिफारिशें भारत सरकार ने मंजूर की थी.”

उन्होंने कहा, ‘‘मैं गर्व से कह सकता हूं कि हमारी सिफारिशों के परिणामस्वरूप भारत के सर्वोच्च न्यायालय में अब तक सबसे बड़ी संख्या में महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई है. भारत को पहली महिला प्रधान न्यायाधीश मिलने की भी संभावना है.’

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