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प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के खिलाफ एक और याचिका

नई दिल्ली: (मानवीय सोच)  सुप्रीम कोर्ट  में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट  के खिलाफ एक और याचिका दायर की गई है. कोर्ट ने करुणेश कुमार शुक्ला की याचिका को भी अन्य याचिकाओं के साथ टैग किया है. सभी पर मंगलवार को सुनवाई होनी है. प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट को कई याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. 

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट यानी पूजास्थल कानून को लेकर सुनवाई से पहले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है. AIMPLB ने फिर SC से प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को नहीं छूने का आग्रह किया है. उसने बाबरी विध्वंस के बाद दंगों और मुंबई विस्फोट लिंक का जिक्र किया. 2002 गुजरात दंगों का हवाला भी दिया. कहा कि कानून के रद्द होने से सांप्रदायिक तनाव पैदा होगा. 

सुप्रीम कोर्ट से पूजा स्थल अधिनियम 1991 के साथ हस्तक्षेप न करने का आग्रह करते हुए AIMPLB ने बाबरी दंगों और 1993 के मुंबई विस्फोटों के बीच लिंक पर श्रीकृष्ण पैनल की टिप्पणी का हवाला दिया है. 

POW Act की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर SC की अहम सुनवाई से दो दिन पहले ये हस्तक्षेप याचिका दायर की गई है. इसमें कहा गया है कि POW अधिनियम का उद्देश्य पूजा स्थलों से संबंधित प्राचीन और पुराने दावों को समाप्त करना है. गौरतलब है कि मुस्लिम पक्ष जमीयत-उलेमा-ए-हिंद और AIMPLB ने पहले सुप्रीम कोर्ट से पूजा स्थल अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका में नोटिस जारी नहीं करने का आग्रह किया था. उन्होंने कहा था कि यह बाबरी विध्वंस और अयोध्या फैसले के कारण हुए सांप्रदायिक विभाजन से अभी भी उबर रहे मुस्लिम समुदाय के मन में भय पैदा करेगा. ये देश में अनगिनत मस्जिदों के खिलाफ मुकदमों की झड़ी खोलेगा, लेकिन 9 सितंबर को कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी कर 11 अक्टूबर यानी सुनवाई की अगली तारीख तक अपना पक्ष रखने को कहा था. 

SC में  AIMPLB की अर्जी में यह हैं प्रमुख बातें- 

– मुंबई में हुए बम विस्फोटों के कारणों से निपटने के दौरान आयोग ने स्पष्ट रूप से पाया कि अगर दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में मुंबई में कोई दंगा नहीं हुआ होता तो मार्च 1993 में बम विस्फोट नहीं होते. स्पष्ट रूप से कहा गया कि दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 के दंगों और मार्च 1993 के बम विस्फोट के बीच एक कारण संबंध है. उन दंगों की अगली कड़ी में हमारे देश ने फरवरी 2002 में एक नरसंहार देखा है, जो कि गुजरात में मुसलमानों के व्यवस्थित नरसंहार के बाद साबरमती एक्सप्रेस कोचों को जलाने में हुआ था.
-इस कानून का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था की ऐसी गड़बड़ी को रोकना और सार्वजनिक शांति बनाए रखना और धर्मनिरपेक्षता की बुनियादी विशेषता को मजबूत करना है.
-पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 भारतीय राजनीति के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को ध्यान में रखते हुए एक प्रगतिशील कानून है और प्रत्येक धार्मिक समूह के अधिकार को राज्य द्वारा समान रूप से व्यवहार करने का अधिकार देता है.
-साथ ही राज्य को विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच तनाव के मामले में उदार तटस्थता अपनाकर अपने कार्यों को करने के लिए आदेश देता है.

 

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