नई दिल्ली (मानवीय सोच) सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र की ओर से अदालतों में जजों की नियुक्ति में हो रही देरी पर नाराजगी जाहिर की। दरअसल, कॉलेजियम की ओर से हाई कोर्ट्स और उच्चतम न्यायाल में जजों की नियुक्ति को लेकर नाम सुझाए गए हैं लेकिन केंद्र सरकार की ओर से इस पर कोई ऐक्शन नहीं लिया गया है। जस्टिस संजय किशन कौल के नेतृत्व वाली बेंच ने कानून सचिव से इस पर जवाब मांगा है।
अदालत ने साफ तौर पर कहा कि नामों को होल्ड पर रखना स्वीकार्य नहीं किया जाएगा। ऐसा करने से ये लोग अपना नाम वापस लेने के लिए मजबूर होने लगते हैं और यह पहले भी हो चुका है। इस प्रक्रिया पर रोक लगनी जरूरी है। इस मामले को लेकर एडवोकेट्स एसोसिएशन बेंगलुरु की ओर से याचिका दायर की गई है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई हुई।
केंद्र के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की अपील
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर वकील विकास सिंह अदालत के समक्ष पेश हुए। उन्होंने SC से केंद्र के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अपील की। सिंह ने पीठ को बताया कि कॉलेजियम की ओर से सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए जस्टिस दीपांकर दत्ता का नाम 5 हफ्ते पहले ही भेजा गया था, लेकिन अभी तक इस पर कोई ऐक्शन नहीं लिया गया है। अदालत ने कहा कि हमें यह नहीं समझ में आ रहा कि यह देरी किस वजह से हो रही है। ऐसे में केंद्रीय कानून सचिव की ओर से इस मामले में हम जवाब जानना चाहते हैं।
SC में 7 जजों के पद खाली
मालूम हो कि देश में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स में बड़ी संख्या में जजों के पद रक्ति होने के कारण बहुत से मामले लंबित हैं। 8 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यू.यू. ललित के सेवानिवृत्त होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में कुल स्वीकृत जजों की संख्या 34 में से 27 कार्यरत रह गई है। 7 जजों के पद खाली हैं। देश के उच्च न्यायालयों में कुल 1108 जजों के पद स्वीकृत है, जबकि कुल 773 पदों पर ही जज कार्यरत हैं और 30 प्रतिशत यानी 335 पद रिक्त हैं।
