वाराणसी (मानवीय सोच) बनारस और आसपास के जिलों के साड़ी व्यापारियों को करोड़ों का चूना लगानेवाले दिल्ली के जालसाजों के गिरोह के सदस्य अजय अरोड़ा उर्फ राहुल सिंह को सिगरा पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अजय अरोड़ा नई दिल्ली के गीता नगर कालोनी का निवासी है। इस गिरोह में आठ लोग शामिल हैं। गिरोह के सात सदस्यों को पुलिस पहले गिरफ्तार कर चुकी थी। आठवें सदस्य अजय अरोड़ा को पुलिस टीम दिल्ली के गीता नगर कालोनी स्थित आवास से पकड़ कर ले आई। इन जालसाजों के खिलाफ दस मुकदमे धारा 406, 417, 419, 420, 467, 468, 471, 473, 120 बी, 504, 506 के तहत सिगरा थाने में दर्ज थे।
पुलिस टीम ने दिल्ली से उसे सिगरा थाने लाकर पूछताछ की तो उसने गिरोह की पूरी कारस्तानी बता दी। एसीपी चेतगंज शिवा सिंह ने बताया कि अजय अरोड़ा नई दिल्ली के गीता नगर थाना क्षेत्र का निवासी है। इसकी पत्नी वंदना वहीं के वैशाली स्कूल में टीचर है। अजय अरोड़ा दिल्ली में ही स्वीगी का डिलिवरी ब्वाय है। इनका संगठित गिरोह है जो बड़े व्यापारी यानी कथित सेठजी की के कर्मचारी बनकर व्यापारियों को चूना लगाते थे। धोखाधाड़ी के धंधे में गिरोह ने अजय अरोड़ा का नाम नाहुल सिंह रख दिया था। इसी नाम पर धंधा हो रहा था। अजय की गिरफ्तारी के लिए 14 दिसम्बर को सिगरा थाने की टीम भेजी गई जो 15 को दिल्ली पहुंची। इसके बाद उसे पकड़ा जा सका।
पूछताछ में अजय अरोड़ा उर्फ राहुल सिंह ने बताया कि गीता नगर कालोनी के ही पति-पत्नी नीलम सोनी और गगन सोनी बनारस में विभिन्न नामों से साड़ी की गद्दियां खोलकर साड़ी व्यवसायियों से सैम्पल के नाम पर साड़ियां मंगाकर धोखाधड़ी करते हैं। इन लोगों के साथ दिल्ली के ही राजू गुप्ता, जसवीर कौर, विशाल शर्मा, संजीव पाठक, अंशु गुप्ता थे। मुझे नीलम सोनी व गगन सोनी दिल्ली से बुलाकर बनारस ले आये थे। इन लोगों ने मेरा नाम अजय अरोड़ा के वजाय व्यापारियों को राहुल सिंह बताया। हर जगह इसी नाम का प्रयोग करते रहे। इसके साथ ही कई जनपदों के व्यापारियों का सैम्पल के नाम पर कीमती साड़ियां मंगाकर उनको कहते थे कि सेठजी आए है। होटल में रूके हैं। आप लोगों की साड़ी पसंद करने के लिए सेठजी के पास भेजी जा रही है। पसंद आने पर रूपयों का भुगतान होगा। यह कहकर गिरोह के लोग व्यापारियों को लौटा देते थे और साड़ियां रख लेते थे। विश्वास जमाने के लिए चेक या कपड़े जमा रहने की रसीद दे देते थे। गिरोह के पास कई विभागों की जाली मुहरें थीं। जहां जिस विभाग की जरूरत होती थी वहां की मुहर लगाकर और हस्ताक्षर करके धंधा करते थे। मुझे जब इनकी धोखाधड़ी का पता चला तो मैं काम छोड़कर वापस दिल्ली चला गया। धोखाधड़ी से मिले धन में से मुझे भी हिस्सा देते थे। गिरोह मुझे 1500 रूपया महीना देता था।
