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BHU में मनुस्मृति रिसर्च और फेलोशिप पर बवाल शुरू

वाराणसी:  (मानवीय सोच)  काशी हिंदू विश्वविद्यालय  का धर्म शास्त्र मीमांसा विभाग आजकल सोशल मीडिया पर चर्चा में है। इसका कारण विभाग के एक प्रोफेसर द्वारा शोध के लिए चुना गया विषय और शोध के फेलोशिप के लिए निकाला गया विज्ञापन है। एक तरफ प्रोफेसर इसे एक रुटीन का विषय बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इस तरह के विषय पर पचासों साल से शोध कार्य हो रहे हैं तो दूसरी ओर छात्र सोशल मीडिया पर “मनुस्मृति” शब्द और विषय के बहाने इसे जातिगत राजनीति और हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार करना बताकर बंटे दिख रहे हैं।

भारतीय समाज में मनुस्मृति की उपयोगिता विषय पर है शोध

डॉक्टर शंकर मिश्र से जब एनबीटी ऑनलाइन ने इस पूरे विषय पर बात की गई तो उन्होंने बताया कि ये कोई नया विषय नहीं है। इस पर बेवजह ही चर्चा की जा रही है। ये एक रुटीन का काम है। इसी तरह के कई विषयों पर पचासों साल से इसी विश्विद्यालय में शोध कार्य हो रहे हैं। देश के किसी भी विश्वविद्यालय में जिस जगह धर्म शास्त्र पढ़ाया जाता है, वहां पर “मनुस्मृति” विषय के रूप में पढ़ाया जाता है और इस पर शोध कार्य भी होते रहते हैं। बेवजह अल्पज्ञानी लोग विवाद कर रहे हैं। किसी भी समाज में धर्म के अनुसार आचरण करने की सीख दी जाती है। उसी आधार पर मनुस्मृति भी एक समाज की परिकल्पना को इंगित करता है।

चार वर्ण, और आश्रम पद्धति पर आधारित है मनुस्मृति

मनुस्मृति के बारे में अल्पज्ञानी लोग विवाद कर राजनीति कर रहे हैं। उन्हें बस ताड़ना जैसे शब्द का एक ही अर्थ पता है, इसलिए उसे महिलाओं से जोड़ कर व्यर्थ में विवाद किया जा रहा है, जबकि मनुस्मृति के अनुसार ताड़ना का अर्थ उद्धार करना, भला करना, लेकिन राजनीति के चक्कर में इसे अलग ही अर्थ दिया गया। ऐसा ही शूद्र शब्द के साथ किया गया है। धर्म के अनुसार हर पैदा होने वाला इंसान शूद्र होता है, जो कर्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र होते थे। शूद्र का अर्थ अनपढ़ और मूर्ख से है, न की किसी जाति विशेष से है। इसी कर्म आधारित समाज को चार आश्रम व्यवस्था में जीवन बिताने के लिए किया गया। जन्म से जाति व्यवस्था तो आधुनिक समाज की देन है।

सोशल मीडिया पर छात्र बंटे दो धड़ों में

सोशल मीडिया पर अब इस विषय को लेकर छात्रों के बीच राय बंटी हुई है। सोशल मीडिया पर कई ऐसे पेज हैं, जो बीएचयू के छात्र नेताओं और संगठनों द्वारा चलाए जाते हैं। वामपंथी रुझान वाले सोशल मीडिया पेज पर एक ओर इसे हिंदू राष्ट्र के बनाने के प्रयासों के तहत देख रहे हैं और मनु स्मृति को महिला विरोधी बता रहे हैं तो दूसरी ओर दक्षिणपंथी विचार रखने वाले छात्र और छात्र संगठन सोशल मीडिया पर इस विषय पर समर्थन में दिख रहे हैं। रामचरित मानस पर टिप्पणी के बाद से ही जाति और महिला विरोध के नाम पर लगातार बवाल मचा हुआ है। ऐसे में अब मनुस्मृति से जुड़े विषय पर हो रहे शोध को लेकर भी कैंपस का माहौल गरमाया हुआ है।

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