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सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ; शिंदे गुट को चुनाव चिह्न देने का फैसला सही

नई दिल्ली: (मानवीय सोच)  शिवसेना चुनाव चिह्न मामले में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है. चुनाव चिह्न एकनाथ शिंदे गुट को देने के फैसले को कानून के मुताबिक बताया. चुनाव आयोग की तरफ से कहा गया है कि एकनाथ शिंदे को चुनाव चिह्न देने का फैसला सही और कारणों सहित दिया गया है. निष्पक्षता ना बरतने के उद्धव ठाकरे के आरोप बेबुनियाद हैं.  ये फैसला आयोग ने संवैधानिक स्तर पर किया है ना कि प्रशासनिक स्तर पर.  ये फैसला नियमों के तहत अर्ध- न्यायिक संस्था के तौर पर लिया गया इसलिए इस मामले में चुनाव आयोग को पक्षकार नहीं बनाया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट के ही फैसला है कि अर्ध- न्यायिक संस्था के तौर पर फैसला लेने वाली बॉडी को अदालत में पक्षकार नहीं बनाया जा सकता, लिहाजा उसे केस की मेरिट पर कुछ नहीं कहना.  इस मामले में उद्धव ठाकरे गुट और शिंदे गुट केस में आगे बढ़ सकते हैं.

दरअसल, 22 फरवरी को उद्धव ठाकरे की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट  ने दखल दिया था. शिंदे  और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था.अदालत ने दो हफ्ते में जवाब मांगा था, हालांकि उद्धव ठाकरे को राहत ना देते हुए बैंक खाते और प्रोपर्टी टेकओवर करने पर रोक नहीं लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के आदेश  पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और कहा था कि वो चुनाव आयोग के फैसले पर रोक नहीं लगा सकता,  हालांकि शिंदे गुट ने भरोसा दिया था कि ठाकरे गुट के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई शुरू नहीं की जाएगी.

बता दें कि शिवसेना चुनाव चिन्ह एकनाथ शिंदे गुट को देने के फैसले के खिलाफ उद्धव ठाकरे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं . उद्धव गुट ने याचिका दायर कर चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी है. उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि चुनाव आयोग की भूमिका निष्पक्ष नहीं रही. चुनाव आयोग का कार्य व्यवहार उसके संवैधानिक कद के अनुरूप नहीं रहा.  याचिका में यह भी कहा गया है कि आयोग ने अयोग्यता की कार्रवाई का सामना कर रहे विधायकों की दलीलों के आधार पर फैसला लेकर गलती की है.

पार्टी में टूट की बात के सबूत की गैर-मौजूदगी में आयोग का फैसला त्रुटिपूर्ण है. उद्धव गुट ने चुनाव आयोग के फैसले पर तत्काल रोक लगाने की मांग की थी. उधर, शिंदे गुट ने सुप्रीम कोर्ट मे कैविएट दाखिल कर मांग कर दी है कि बिना उसका पक्ष सुने कोई एकतरफा फैसला ना लिया जाए.  दरअसल  केन्द्रीय चुनाव आयोग ने अपने फैसले में शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को इस्तेमाल की इजाजत दे दी थी.

उद्धव ठाकरे गुट की याचिका में कहा गया है कि ECI ने 1999 के संविधान पर विचार किया जबकि 2018 का संशोधित संविधान लागू था. उन्हें  2018 के संविधान को रिकॉर्ड पर रखने के लिए अधिक समय नहीं दिया गया था – 2018 के संशोधित संविधान के अनुसार, शिवसेना प्रमुख पार्टी में सर्वोच्च प्राधिकारी होंगे जो किसी भी पद पर नियुक्तियों को रोक सकते हैं, हटा सकते हैं या रद्द कर सकते हैं और जिनके निर्णय सभी पार्टी मामलों पर अंतिम हैं, लेकिन 1999 के संविधान के अनुसार पार्टी प्रमुख के पास खुद से पदाधिकारियों को मनोनीत करने की शक्ति नहीं थी.

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