लखनऊ : (मानवीय सोच) एक अच्छी खासी इकाई किस तरह लापरवाह सरकारी कार्यशैली की भेंट चढ़ती है, इसका उदाहरण है एटा का यार्न संयंत्र सेंट्रल स्लिवर। 1997 में स्थापित यह इकाई 2020 में केवल इसलिए बंद कर दी गई क्योंकि इसे बिजली कनेक्शन नहीं मिल सका। इस दौरान इकाई पूरी तरह जनरेटर पर चलती रही। इससे बिजली की लागत 5 रुपये यूनिट के बजाय 40 रुपये यूनिट हो गई। उत्पादन लागत ज्यादा होने से आखिरकार इकाई पर ताला लग गया।
केंद्रीय एमएसएमई विभाग के अधीन खादी ग्रामोद्योग आयोग ने एटा में यह इकाई स्थापित की थी। सीएजी ने इसके बंद होने के कारणों की पड़ताल की। इसमें पता चला कि अगर समय रहते बिजली कनेक्शन मिल गया होता तो संयंत्र को बचाया जा सकता था। इस प्लांट की स्थापना 1997 में खादी संस्थानों को मीडियम काउंट रोविंग की आपूर्ति के लिए की गई थी। यूनिट को पावर कॉरपोरेशन ने 1996 में 250 केवीए के स्वीकृत भार के साथ बिजली कनेक्शन दिया था। इसके एवज में सिक्योरिटी के रूप में 16.13 लाख रुपये लिए थे। 1999 में प्लांट ने बिजली आपूर्ति बार-बार बाधित होने से कनेक्शन कटवा दिया।
