तमिलनाडु (मानवीय सोच) सीएम एम के स्टालिन ने गुरुवार को पीएम नरेंद्र मोदी और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना को चिट्ठी लिखकर तीन मांगें रखी हैं। सीएम स्टालिन की पहली मांग है कि तमिल भाषा को मद्रास हाई कोर्ट की आधिकारिक भाषा घोषित की जाए। सीएम स्टालिन ने तर्क दिया कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश के हाई कोर्ट में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी भी आधिकारिक भाषा है। स्टालिन ने आगे लिखा- इसलिए आश्चर्य होता है कि अन्य राज्यों की राजभाषा को इंग्लिश के साथ हाई कोर्ट की राजभाषा बनाने में क्या बाधा है?
पीएम ने कहा था स्थानीय भाषाओं में हो कोर्ट की कार्रवाई
स्टालिन ने लिखा- कानून और न्याय को आम लोगों की पहुंच तक लाने और कोर्ट की कार्रवाई को समझने के लिए जरूरी है कि न्याय व्यवस्था में कुछ बदलाव किए जाएं। गौरतलब है कि स्टालिन की ये चिट्ठी ऐसे समय पर आई है जब पिछले दिनों चीफ जस्टिस और केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू की मौजूदगी में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि देशभर में मौजूद अदालतों में स्थानीय भाषाओं में सुनवाई होनी चाहिए ताकि वहां के स्थानीय लोगों को कोर्ट की कार्रवाई और उसके काम करने के तरीके के बारे में उसमें समझ विकसित हो।
जजों की नियुक्ति में हो विविधता
पीएम मोदी ने कहा था कि हमें कोर्ट में स्थानीय भाषा को बढ़ावा देना चाहिए। इससे आम लोगों में कोर्ट को लेकर आत्मविश्वास बढ़ेगा और वो कानून व्यवस्था से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करेगा। इसके अलावा स्टालिन ने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति में विविधता लाने की भी मांग की है। सीएम स्टालिन ने लिखा- पिछले कुछ सालों में हम देख रहे हैं कि उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति में विविधता की कमी है। समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले जजों का समूह व्यापक दृष्टिकोण बनाता है। खास तौर पर ऐतिहासिक, पारंपरिक, भाषाई और सांस्कृतिक मामलों से जुड़े मुद्दों को लेकर एक विस्तृत समझ विकसित होती है।
सुप्रीम कोर्ट की रीजनल बेंच की मांग
सीएम स्टालिन ने तीसरे मुद्दे के रूप में सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय बेंच स्थापित करने की मांग की है। हालांकि ये मांग लंबे समय से की जा रही है। संविधान के आर्टिकल 32 का हवाला देते हुए सीएम स्टालिन ने कहा कि संविधान का आर्टिकल 32 कहता है कि देश के सभी लोगों, अमीर या गरीब सबकी पहुंच देश के शीर्ष अदालत तक होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भौगोलिक रूप से नई दिल्ली से काफी दूर होने की वजह से दक्षिण भारत के लोगों की पहुंच सुप्रीम कोर्ट तक नहीं हो पाती इसलिए कई लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के उनके अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाते।
