मां-बाप को बड़ी राहत: पुत्र के मरने के 8 साल बाद मिलेगा बीमा पालिसी का 14.50 लाख

लखनऊ (मानवीय सोच)  पुत्र की मृत्यु के आठ साल बाद भी पालिसी का पैसा न मिल पाने से परेशान आगरा निवासी माता-पिता को राज्य उपभोक्ता आयोग ने बड़ी राहत दी है। आयोग के फैसले से परेशान मां-बाप को अब मृतक पुत्र की बीमा पालिसी का 14.50 लाख रुपया मिल सकेगा।

आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने चार साल से लंबित विवाद का निपटारा करते हुए आदेश दिया कि बीमा कंपनी पालिसी की पूरी देयता राशि 14.50 लाख रुपया चुकाए। साथ ही बीमित की मृत्यु की तिथि से भुगतान की तिथि तक 8 फीसदी ब्याज, वाद खर्च व मानसिक प्रताड़ना के हर्जाना के 30 हजार रुपया भी याची को चुकाएगी।

आगरा के लोहामंडी निवासी मूलचंद यादव ने वर्ष 2011 में अपने पुत्र सनी यादव के नाम पर एलआईसी से 7.50 लाख व 7 लाख रुपये की दो पालिसी ली थी। इसमें पहली पालिसी में नामिनी के बतौर पिता मूलचंद व दूसरी पालिसी में मां शशी यादव को नामिनी बनाया गया था। 

इन दोनों ही पालिसी के लिए बीमित की तरफ से तीन साल में बीमा कंपनी को बतौर पालिसी किश्त 68,208 रुपया भी चुकाया गया। वर्ष 2014 में 20 वर्ष की आयु में सनी की मृत्यु हो गई। इसके बाद चार साल तक मृतक के माता-पिता पुत्र की पालिसी का पैसा पाने के लिए एलआईसी के आगरा स्थित 265 सिटी ब्रांच आफिस के चक्कर काटते रहे।

कंपनी ने बीमा करते समय दस्तावेजों में तो मूलचंद यादव व शशी यादव को बीमित का पिता व माता दर्शाया लेकिन पालिसी बांड जारी करते समय बीमित के उत्तराधिकारी (नामिनी) में माता पिता के नाम का उल्लेख नहीं किया। अब बीमा कंपनी इसी आधार पर मां-बाप को नामिनी न मानते हुए बीमित की पालिसी के भुगतान से बच रही थी। परेशान हो कर पीड़ित मूलचंद ने राज्य उपभोक्ता आयोग में पालिसी का भुगतान दिलाने की गुहार लगाई।

बीमा कंपनी ने खेला बीमारी का भी दांव
आयोग की सुनवाई में बीमा कंपनी की तरफ से बताया गया कि बीमित मृतक बीमा कराते समय ब्लड कैसर की गंभीर बीमारी से पीड़ित था। बीमा कराते समय इस बीमारी की जानकारी को जानबूझ कर छिपाया गया। दूसरी तरफ वादी पक्ष का कहना था कि अगर ऐसा था तो बीमित की मृत्यु के तीन साल बाद बीमा कंपनी ने पत्र भेजकर बीमारी का मसला क्यो उठाया। इससे पूर्व बीमा कंपनी उक्त दोनों बीमा दावे कानूनी उत्तराधिकारी के पक्ष में स्वीकृत किए जाने की बात कहते हुए सक्षम न्यायालय से उत्तराधिकारी प्रमाणपत्र की मांग कर चुकी थी।

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