नई दिल्ली (मानवीय सोच) इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर व पवन ऊर्जा, अत्याधुनिक स्मार्ट फोन व दूसरे अत्याधुनिक उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले बहुमूल्य धातुओं के खनन, शोधन व आपूर्ति को लेकर क्वाड देशों के बीच बड़े सहयोग की नींव पड़ चुकी है। इस हफ्ते भारत के दौरे पर आने वाले क्वाड के दो देशों के नेताओं के साथ इस बारे में और विस्तार से बात होगी।
सूत्रों ने बताया कि वर्ष 2021 में क्वाड देशों के प्रमुखों की ऑनलाइन बैठक में पहली बार बहुमूल्य धातुओं के खनन, शोधन व वितरण के क्षेत्र में एक वैकल्पिक व्यवस्था करने को लेकर बात हुई थी। तब तक दुनिया में बहुमूल्य धातुओं जैसे नियोडाइमियम, लिथियम, सेरियम, प्रोमेथियम, यूरोपियम आदि के उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी 70 फीसद के करीब थी।
कोरोना के बाद वैश्विक सप्लाई चेन में भारी बाधा आने के पीछे मुख्य कारण यही रहा है कि उक्त धातुओं के दुनियाभर के अधिकांश खदानों पर चीन का मालिकाना हक था और इनकी आपूर्ति बाधित होने से भारत, अमेरिका को भी नुकसान उठाना पड़ा था। इस परेशानी को देख ही क्वाड देशों के शीर्ष नेताओं ने अपने संबंधित अधिकारियों को वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया था।
एंथोनी अलबिनीज और PM मोदी के बीच होगी वार्ता
पिछले डेढ़ वर्षों के दौरान इस बारे में चारों देशों के बीच कई स्तरों की बातचीत हुई है। नई दिल्ली में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त बैरी ओ फैरेल ने बताया है कि ऑस्ट्रेलिया और भारत के पीएम के बीच होने वाली इस हफ्ते मुलाकात में बहुमूल्य धातुओं के खनन में सहयोग को लेकर बातचीत होगी।
भारत की कंपनी खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड और ऑस्ट्रेलिया की सरकारी एजेंसी के साथ पहले ही एक समझौता हो चुका है। पिछले वर्ष पीएम मोदी और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व पीएम स्काट मारीसन के बीच हुई वर्चुअल बैठक में भी यह मुद्दा था, लेकिन इस बार में दोनों तरफ के संबंधित विभागों की तरफ से प्रधानमंत्रियों के समक्ष अभी तक की प्रगति रखी जाएगी।
वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि 10 मार्च, 2023 को भारत-अमेरिका कमर्शियल डायलॉग में बहुमूल्य धातुओं के खनन व उत्पादन में आपसी सहयोग को लेकर ठोस बातें होंगी। बताते चलें कि सोलर पैनल से लेकर मोबाइल फोन और अत्याधुनिक इवी बनाने से लेकर इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के निर्माण में कई तरह के बहुमूल्य धातुओं का इस्तेमाल बढ़ रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका की रिपोर्ट बताती है कि अभी बहुमूल्य धातुओं के दुनिया में जितने खदान है उसमें 60 फीसद चीन की कंपनियों के कब्जे में है।
