लखनऊ (मानवीय सोच) प्रदेश में घटिया आयुर्वेदिक दवाओं का कारोबार चल रहा है। किसी दवा की गुणवत्ता खराब है तो किसी में संबंधित तत्व ही नहीं है। जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हो रहा है। इसके बाद भी अफसर मौन हैं। वे अब दवाओं के सैंपल लेने से ही कतराने लगे हैं। ऐसे में इन अफसरों की मेहरबानी से लोगों के जीवन से खिलवाड़ हो रहा है।
प्रदेश में आयुर्वेद विभाग के अधीन दवाओं की जांच केलिए अलग से ड्रग इंस्पेक्टर नहीं हैं। यह जिम्मा हर जिले के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी के पास है। इन्हें हर माह कम से कम दो सैंपल लेकर जांच के लिए भेजने का निर्देश है, लेकिन ये अधिकारी सैंपल लेने में कतराते हैं। सूत्रों का कहना है कि विभागीय अधिकारियों और आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली कंपनियों की सांठगांठ से यह खेल रहा है।
अधिकारी खुद को विभिन्न कार्यों में व्यस्त होने का हवाला देकर जांच से बचते रहते हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अप्रैल से जून तक विभाग की केंद्रीय लैब में कम से कम 600 सैंपल पहुंचने चाहिए थे, लेकिन सिर्फ 40 सैंपल आए हैं। करीब 30 जिलों ने एक भी सैंपल नहीं भेजा है। खास बात यह है कि जितने सैंपल आए, उसमें जांच केदौरान ज्यादातर फेल हो गए। किसी में गुणवत्ता खराब मिली तो किसी में दवा कंपनी को ओर से बताए गए तत्व कम मिले। इस पर संबंधित कंपनियों को नोटिस जारी कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली गई।
जब भी हुई जांच सैंपल हुए फेल
2021-22 में 85 सैंपल की जांच की गई थी, जिसमें 60 फेल हो गए। इसी तरह वर्ष 2020 में 36 में 21, वर्ष 2019 में 66 में 45 सैंपल फेल हुए थे। अप्रैल में हुई दवाओं की जांच में 72 फीसदी आयुर्वेदिक दवाएं अधोमानक पाई गई थीं। इन सभी कंपनियों को नोटिस जारी किया गया था।
क्या कहते हैं जिम्मेदार
पिछले दिनों सभी क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारियों को नोटिस जारी कर चेतावनी दी गई है। सभी को कम से से दो सैंपल हर माह भेजने का निर्देश दिया गया है। उन्हें दोबारा रिमाइंडर भेजा जा रहा है। जिस कंपनी के सैंपल अधोमानक मिले थे, उन्हें भी नोटिस जारी किया गया था।
– डा. एसएन सिंह, निदेशक आयुर्वेद
प्रदेश में किसी भी कीमत पर अधोमानक दवाओं का कारोबार नहीं चलने दिया जाएगा। सभी अफसरों को निर्देश दिया गया है। समीक्षा में इसे बिंदु को भी रखा जाएगा कि किस जिले से कितने सैंपल भेजे गए। आयुर्वेदिक दवा का कारोबार करने वालों का किसी तरह का उत्पीड़न नहीं होना चाहिए, लेकिन गुणवत्ता की जांच भी जरूरी है।
