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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने विश्वविद्यालय में महन्त दिग्विजयनाथ प्रेक्षागृह एवं हीरक जयन्ती द्वार का शिलान्यास तथा हीरक जयन्ती स्पोर्ट्स स्टेडियम के शिलापट्ट का अनावरण किया

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने आज गोरखपुर में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हीरक जयन्ती समारोह के अवसर पर विश्वविद्यालय में महन्त दिग्विजयनाथ प्रेक्षागृह एवं हीरक जयन्ती द्वार का शिलान्यास तथा हीरक जयन्ती स्पोर्ट्स स्टेडियम के शिलापट्ट का अनावरण किया। उन्होंने डाक विभाग के विशेष डाक कवर, विश्वविद्यालय की स्मारिका एवं विश्वविद्यालय के प्राध्यापकां द्वारा लिखित पुस्तकों का विमोचन किया तथा विश्वविद्यालय के पुरातन छात्रों को सम्मानित भी किया।
मुख्यमंत्री जी ने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर की हीरक जयन्ती की बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय 75 वर्षों की यात्रा को पूर्ण कर आज एक नई यात्रा पर आगे बढ़ रहा है। यह 75 वर्ष की स्मृतियों को स्मरण करने तथा आगामी 25 वर्षों की कार्ययोजना बनाने का अवसर है। मई, 1950 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं0 गोविन्द बल्लभ पंत द्वारा दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गयी थी।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि 24 जनवरी, 1950 को उत्तर प्रदेश राज्य का नोटिफिकेशन जारी हुआ था। 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था। संविधान लागू होने के बाद स्वतंत्र भारत का पहला विश्वविद्यालय गोरखपुर में स्थापित हुआ। यह यात्रा अचानक प्रारम्भ नहीं हुई थी। उस समय गोरखपुर के कुछ विशिष्ट लोग चाहते थे कि गोरखपुर उच्च शिक्षा का केन्द्र बने। उस समय संसाधन नही थे। गोरखपुर को जोड़ने के लिए व्यवस्थित कनेक्टिविटी भी नहीं थी। तब यहां के वरिष्ठ अधिवक्ता पं0 बब्बन मिश्र एवं सेन्ट एण्ड्रयूज कॉलेज के प्राचार्य डॉ0 पी0सी0 चाको ने विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए चर्चा को आगे बढ़ाया और महन्त दिग्विजयनाथ जी से विश्वविद्यालय स्थापना के लिए सरकार से मांग करने का अनुरोध किया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि महन्त दिग्विजयनाथ जी एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका तत्कालीन मुख्यमंत्री पं0 गोविन्द बल्लभ पन्त जी से घनिष्ठ सम्बन्ध था। तत्कालीन मुख्यमंत्री जी ने सुझाव दिया कि यदि क्षेत्र के लोग पूंजी एकत्र करके कार्य करेंगे, तो कार्य आगे बढ़ाया जा सकता है। उस समय लगभग 50 लाख रुपये विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए चाहिए थे। इतनी पूंजी किसी के पास नहीं थी। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद से जुड़े समाजसेवी सरदार सुरेन्द्र सिंह मजीठिया को इस अभियान से जोड़ा गया। इसके बाद यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई गयी। इसके उपरान्त प्रदेश सरकार ने विश्वविद्यालय के निर्माण की अपनी सहमति दी थी। विश्वविद्यालय के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई।

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