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राज्य सरकार ने अधिसूचित की शवों के अंतिम संस्कार की योजना, हाईकोर्ट को अधिसूचना की दी जानकारी

उत्तर प्रदेश  (मानवीय सोच)    बहुचर्चित हाथरस कांड मामले में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि ऐसे केसों में शवों के गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार की नई योजना (एसओपी) को अधिसूचित कर दिया गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मामले की अगली सुनवाई दो नवंबर को नियत की है। न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने यह आदेश ‘शवों के गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार का अधिकार’ शीर्षक से खुद संज्ञान लेकर दर्ज कराई गई पीआईएल पर सुनवाई के बाद दिया। कोर्ट में हाथरस कांड संबंधी मुद्दों पर सुनवाई चल रही है।

कोर्ट ने पहले इसके लिए दिशा-निर्देश तय करने का आदेश राज्य सरकार को दिया था। पिछली सुनवाई पर कोर्ट के समक्ष इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकार ने एसओपी का प्रारूप पेश किया था जिस पर कोर्ट ने कुछ सुझाव भी दिए थे। कोर्ट ने आदेश दिया था कि हम उम्मीद करते हैं कि राज्य के अधिकारी इस योजना/एसओपी के अनुसार इसे अधिसूचित होने पर कार्रवाई करेंगे। कोर्ट ने सरकार को कहा था कि सरकारी अफसरों व कर्मचारियों को, जो ऐसे शवों के दाह संस्कार में शामिल होने वाले हैं, उन्हें एसओपी का सख्ती से और इस तरह से पालन करने के लिए संवेदनशील और परामर्श दिया जाना चाहिए ताकि इसका उद्देश्य को विफल न हो। एसओपी का पालन महज औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। एसओपी का सार और भावना सर्वोपरि है। क्योंकि यह मूल्यवान संवैधानिक और मौलिक अधिकारों को छूती है। इस तरह के अधिकारों के संबंध में पूरी प्रक्त्रिस्या को एक गंभीर तरीके से संचालित किया जाना चाहिए।एसओपी का हो व्यापक प्रचार-प्रसार: कोर्ट
कोर्ट ने आदेश में कहा था कि राज्य एसओपी  को अधिसूचित कर सकता है और यह सुनिश्चित कर सकता है कि पूरे प्रदेश में इसका पालन किया जा रहा है। एसओपी का पुलिस थानों, अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला मुख्यालयों, तहसीलों आदि में व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए ताकि अधिसूचित होने के बाद हितधारक इससे अवगत हो सकें।

यह है मामला
कोर्ट ने 12 अक्तूबर 2020 को सुनवाई के दौरान हाथरस में परिवार की मर्जी के बिना रात में मृतका का अंतिम संस्कार किए जाने पर तीखी टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि बिना धार्मिक संस्कारों के युवती का दाह संस्कार करना पीड़ित, उसके स्वजन और रिश्तेदारों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। इसके लिए जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई करने की आवश्यकता है। कोर्ट ने इस मामले में मीडिया, राजनीतिक दलों व सरकारी अफसरों की अतिसक्त्रिस्यता पर भी नाराजगी प्रकट करते हुए उन्हें इस मामले में बेवजह बयानबाजी न करने की हिदायत भी दी थी।

मालूम हो कि उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के बूलगढ़ी गांव में गत 14 सितंबर 2020 को दलित युवती से चार लड़कों ने कथित रूप के साथ सामूहिक दुष्कर्म और बेरहमी से मारपीट की थी। युवती को पहले जिला अस्पताल, फिर अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया गया। हालत खराब होने पर पर उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल रेफर कर दिया गया जहां 29 सितंबर को मृत्यु हो गई थी। मौत के बाद आनन-फानन में पुलिस ने रात में उसके शव का अंतिम संस्कार कर दिया था जिसके बाद काफी बवाल हुआ। परिवार का कहना था कि उनकी मर्जी के खिलाफ पुलिस ने पीड़िता का अंतिम संस्कार कर दिया हालांकि पुलिस इन दावों को खारिज कर रही थी।

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