यूपी परिवहन निगम को लगी 84 करोड़ रुपये की चपत

लखनऊ  (मानवीय सोच)  उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के अधिकारियों की लापरवाही से 84.02 करोड़ रुपये की चपत लगी है। परिवहन निगम के दो मामलों में ही यह गड़बड़ी पकड़ में आई है। यह खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में हुआ है। यह रिपोर्ट बुधवार को विधानसभा व विधान परिषद दोनों ही जगह रखी गई। इसमें निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।

परिवहन निगम ने अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन कर एक निजी फर्म ट्राइमैक्स को 69.84 करोड़ रुपये अधिक भुगतान कर दिया। इसके अलावा दूसरे मामले में फास्टैग के जरिए टोल टैक्स का भुगतान न करके बैंक से मिलने वाले कैशबैक में 14.18 करोड़ रुपये नुकसान उठाया है।

कैग ने जो आपत्ति की है उसके अनुसार निगम ने फरवरी 2013 में पांच वर्षों की अवधि के लिए निजी फर्म ट्राइमैक्स आइटी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड सर्विसेज लिमिटेड मुंबई के साथ एक अनुबंध किया था। यह अनुबंध इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम (आइटीएमएस) की आपूर्ति, स्थापना एवं संचालन के लिए किया गया था। इसके तहत एकीकृत टिकट प्रणाली, वाहन ट्रैकिंग प्रणाली और यात्रियों को सूचना प्रणाली प्रदान किया जाना था।

परिवहन निगम द्वारा ट्राइमैक्स को किए गए भुगतान से संबंधित अभिलेखों की जांच के दौरान कैग को कई कमियां देखने को मिली हैं। आइटीएमएस विभिन्न क्षेत्रों में अप्रैल 2014 से नवंबर 2015 के बीच गो-लाइव हो पाया था। इसके बावजूद परिवहन निगम ने ट्राइमैक्स को गो-लाइव की अवधि से पूर्व का भी भुगतान कर दिया।

कैग ने यह भी पाया कि नेशनल कंपनी ला ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने फरवरी 2019 में ट्राइमैक्स के विरुद्ध कारपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू की तो परिवहन निगम ने भुगतान करना बंद कर दिया लेकिन ट्राइमैक्स ने नवंबर 2020 तक काम जारी रखा। इस तरह मार्च 2019 से नवंबर 2020 तक की अवधि का बकाया बिल 43.89 करोड़ रुपये था, जबकि नवंबर 2020 तक ट्राइमैक्स से कुल वसूली योग्य धनराशि 69.84 करोड़ रुपये थी।

वहीं, नेशनल इलेक्ट्रानिक टोल कलेक्शन प्रोग्राम समय से लागू न कर पाने के कारण परिवहन निगम को टोल टैक्स के भुगतान पर 14.18 करोड़ रुपये का कैशबैक नहीं मिल पाया। परिवहन निगम ने जुलाई 2017 से मार्च 2020 के दौरान कुल 624.33 करोड़ रुपये टोल टैक्स का भुगतान किया। इसमें से मात्र 283.85 करोड़ रुपये का भुगतान ही फास्टैग के जरिए किया गया।

ऐसे में 340.48 करोड़ रुपये के टोल टैक्स का भुगतान बगैर फास्टैग के किया गया। इससे 14.18 करोड़ रुपये का कैशबैक नहीं मिल सका। परिवहन निगम ने अपने स्पष्टीकरण में स्वीकार किया कि जुलाई 2017 से मार्च 2019 के दौरान उनकी बसों में फास्टैग कम लगे थे। निगम ने इसके लिए सेवा प्रदाता बैंकों को जिम्मेदार बताया है। हालांकि, कैग ने इस सफाई को नहीं माना है।

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