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आजादी के संघर्षों का गवाह है 167 साल पुराना इमली का पेड़

शहीदों के मजारों पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा। टीले वाली मस्जिद में लगा इमली का दरख्त हिन्दुस्तान की पहली जंगे आजादी गवाह है। हालांकि इस दरख्त के इर्दगिर्द न तो शहीदों की कोई मजार है और न ही यहां पर मेले ही जुड़ते हैं। वतन की आजादी के लिए अपनी हर शाख पर लटके एक-एक शहीद के दर्द और तकलीफ की यादों के निशान इमली का ये दरख्त खामोशी से 167 साल से अपने सीने में महफूज रखे है। गंगा-जमुनी तहजीब के मरकज नवाबों का शहर की रेजीडेंसी, दिलकुशा कोठी सहित कई ऐतिहासिक इमारतें वर्ष 1857 में हुई हिन्दुस्तान की पहली जंगे आजादी की गवाही दे रही हैं।

शहर की ऐतिहासिक टीले वाली मस्जिद भी स्वतंत्रता संग्राम की गवाह है। मस्जिद परिसर में लगे इमली के दरख्त पर करीब 40 से 80 क्रांतिकारियों को कच्ची फांसी दी गई थी। कच्ची फांसी का अर्थ यह है कि इसमें व्यक्ति को लटका दिया जाता है। धीमे-धीमे वह व्यक्ति कई दिनों के बाद कमजोर होता-होता आखिरकार मर जाता है। अवध में बेगम हजरत महल की अगुवाई में आजादी की पहली जंग लड़ी गई थी। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी। आखिर में ब्रिटिश हुकूमत ने मौलवी रसूल बक्श, हाफिज अब्दुल समद, मीर अब्बास, मीर कासिम अली और मम्मू खान सहित जंगे आजादी के कई सिपाहियों को पकड़ लिया था। पकड़े गए तमाम गुमनाम क्रांतिकारियों को इमली के पेड़ से लटका कर शहीद कर दिया गया।

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