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पहली बार जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कश्मीरी पंडितों को मिलेगा आरक्षण

नई दिल्ली  (मानवीय सोच) जम्मू कश्मीर के लिए परिसीमन आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है। रिपोर्ट में आयोग ने जिन-जिन बातों की सिफारिश की है, उससे एक बात तो साफ हो गई है कि इससे जम्मू कश्मीर की पॉलिटिक्स पूरी तरह बदल जाएगी। पहली बार कश्मीरी पंडितों और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान शामिल किया गया है। हाल ही में कश्मीरी पंडितों पर आई फिल्म द कश्मीर फाइल्स के बाद आयोग की रिपोर्ट में कश्मीरी प्रवासियों का जिक्र करना बड़ी बात है।

परिसीमन आयोग की रिपोर्ट में जम्मू संभाग में छह व कश्मीर संभाग में एक विधानसभा सीट को बढ़ाया गया है। कुल मिलाकर जम्मू संभाग के लिए 37 सीटें और कश्मीर के लिए 47 विधानसभा सीटों की सिफारिश की गई हैं। हालांकि अनुसूचित जाति के लिए पहले की तरह ही सात विधानसभा सीटें आरक्षित रखी गई हैं।

जम्मू कश्मीर के लिए परिसीमन आयोग की रिपोर्ट के बाद माना जा रहा है कि इसी साल नवंबर माह में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। विधानसभा और लोकसभा सीटों को परिसीमन आयोग ने जो गणित तय किया है वो इस प्रकार है-

कुल लोकसभा सीटेंः 5
कुल विधानसभा सीटें: 90
कश्मीर संभाग : 47
जम्मू संभाग: 43
अनुसूचित जाति: 07
अनुसूचित जनजाति : 09
कश्मीरी पंडितः 02

हर लोकसभा में 18 विधानसभा सीटें
परिसीमन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में हर लोकसभा सीट में 18 विधानसभा सीटों को रखा है। केंद्र शासित प्रदेश बनने से पहले जम्मू कश्मीर विधानसभा में 87 सीटें थी, जिसमें चार सीटें लद्दाख की शामिल थीं। लद्दाख के अलग होने के बाद इन सीटों की संख्या 83 सीटें रह गईं, जो अब आयोग की रिपोर्ट के बाद 90 हो जाएंगी। वहीं, पहले कश्मीर संभाग में बारामूला, अनंतनाग, श्रीनगर और जम्मू संभाग में उधमपुर डोडा व जम्मू विधानसभा सीटें थीं। अब परिसीमन आयोग की फाइनल रिपोर्ट में अनंतनाग सीट अनंतनाग-राजोरी पुंछ बन जाएगा। इसके तहत जम्मू सीट से दो जिले राजोरी व पुंछ अनंतनाग में शामिल कर किए गए हैं।

पहले कब हुआ था परिसीमन
जम्मू-कश्मीर में आखिरी बार परिसीमन 1995 में हुआ था। उस समय जम्मू-कश्मीर में 12 जिले और 58 तहसीलें हुआ करती थीं। इस वक्त जम्मू कश्मीर में 20 जिले और 270 तहसील हैं। 1995 में किया गया परिसीमन 1981 की जनगणना के आधार पर हुआ था। इस बार 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन आयोग ने अपनी फाइनल रिपोर्ट बनाई है।

जम्मू हिन्दु बहुल तो कश्मीर मुस्लिम बहुल
कश्मीर मुस्लिम बहुल है और जम्मू हिंदू बहुल। इसलिए बीजेपी को जम्मू में फायदा मिलने की उम्मीद है। वहीं, घाटी में पीडीपी और एनसी की अच्छी पकड़ है। घाटी की सत्ता में लंबे वक्त से चल रहे नेशनल काफ्रेंस के नेता परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को लेकर सवाल खड़े करते रहे हैं। उनका कहना है कि जम्मू संभाग छोटा है इसलिए यहां विधानसभा सीटें नहीं बढ़ाई जानी चाहिए। इसके पीछे बड़ी वजह साल 2014 का विधानसभा चुनाव है। उस वक्त बीजेपी 25 सीटें (37 में से) जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। अब तक के चुनावों में देखा गया है कि घाटी में बेहतर प्रदर्शन करके भी सरकार बन जाती थी, लेकिन सीटें बढ़ने के बाद जम्मू में भी ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना जरूरी हो जाएगा। इस वजह से राजनीतिक समीकरण बदलना स्वाभाविक है।

 

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