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भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का साक्षात रूप है गोवर्धत पर्वत

मथुरा  (मानवीय सोच)   ब्रज के सभी स्थल भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े हैं। गिरिराज पर्वत भी उन्हीं लीलाओं का एक साक्षात रूप है। ब्रजवासियों में एक कहावत है कि एक रूप से पुजत हैं और दूजे रूप रहे पुजाय अर्थात गिरिराज जी के रूप में श्रीकृष्ण स्वयं पुज रहे हैं और दूसरे रूप में गिरिराजजी की पूजा कर रहे हैं, जो भी हो रहा है वही श्रीकृष्ण कर रहे हैं। प्रमाण के लिए गिरिराज मुकुट मुखारविंद मंदिर पर देखा जा सकता है।

पुराणों में उल्लेख है कि जब गोलोक धाम के स्वामी श्रीकृष्ण ने अपनी शक्ति के साथ पृथ्वी पर मनुष्य रूप में लीला करने की इच्छा की, तब भगवान श्री विष्णु जी, शंकर जी और ब्रह्मा जी ने भी लीला में शामिल होने की अनुमति मांगी। उन्होंने इन तीनों देवों को लीला में शामिल होने की अनुमति नहीं दी। इन तीनों देवताओं ने श्रीकृष्ण से काफी अनुनय-विनय की, तब उन्होंने कहा कि तुम तीनों देव ब्रज में जाकर पर्वत बन जाओ। द्वापर में मैं उन्हीं पर्वतों पर लीला करूंगा।
श्रीकृष्ण भगवान के आदेश से विष्णु भगवान ने गिरिराज पर्वत के रूप में गोवर्धन में, शंकर भगवान ने नंदगांव में और ब्रह्मा जी ने ब्रह्मांचल पर्वत बरसाना में रूप धारण किया। पहले ब्रज में इंद्र देवता की पूजा होती थी, श्रीकृष्ण के समय इंद्र को इतना अभिमान हो गया कि ब्रज में वर्षा नहीं की।

कृष्ण ने अंगुली पर धारण किया था पर्वत

भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र का अभिमान तोड़ने और भगवान विष्णु को दिए वचन का पालन करने के लिए ब्रजवासियों से गोवर्धन पर्वत की पूजा कराई। इससे इंद्र और नाराज हो गए। उन्होंने ब्रज को डुबोने की ठान ली और सात दिन, सात रात भारी वर्षा की। तब भगवान श्रीकृष्ण ने पांच वर्ष की अवस्था में गिरिराज पर्वत अपनी अंगुली पर धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा की।

अंत में इंद्र देवता ने देखा कि इतना पानी बरसने के बाद भी ब्रज डूबा क्यों नहीं। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण से माफी मांगी। तब श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों से कहा कि जो गोवर्धन महाराज को पूजेगा, उसकी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होगी। तभी से ब्रजवासी गोवर्धन गिरिराज महाराजजी की परिक्रमा लगा रहे हैं। आज गिरिराजजी देश-विदेश के लोगों की आस्था का केंद्र बन गए हैं। गिरिराजजी की परिक्रमा के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ रहा है।

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